हार्दिक अभिनंदन

अपनेक एहि सिंगरहार मे हार्दिक अभिनंदन अछि

Search This Blog

Thursday, August 29, 2013

भूख भुनाती सरकार

देश की माली हालत पर संसद के अन्दर-बाहर हो रही चर्चाओं में हर कोई इस दुर्दशा का जिम्मेवार सरकार को ठहराता नजर आता है, नजरिया चाहे जो भी रहा हो। भाजपा के वरिष्ट नेता यसवंत सिन्हा समझ नहीं पा रहे कि आखिर सरकार की अकर्मण्यता का कारण क्या है? पिछले कई सालों से सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी क्यों है? देश को गहरे संकट में धकेलने के पीछे आखिर उसकी मंशा क्या है? अदि-अदि। तो बीजू जनता दल के युवा नेता जय पांडा कमोबेश ऐसा ही आश्चर्य व्यक्त करते हुए संसद में यह कहते हुए अफसोस जाहिर करते हैं कि सरकार चाहती तो कलम की नोंक से एक फैसला लिखकर स्थितियों में व्यापक बदलाव कर सकती थी पर न जाने क्यों उसने ऐसा नहीं किया! वहीं जो आर्थिक मामलों की जानकारी में आम आदमी की तरह ही तंगअक्ल हैं वे देश की दुर्दशा के लिए बुनियादी मामलों में सरकार की नाकामियों को गुनाहगार ठहराते हैं। मसलन, शरद यादव को लगता है कि किसानों को महज पानी उपलब्ध कराने पर ही सरकार ध्यान देती और उसमें सफल हो जाती तो देश के किसान हमारा और अपना पेट मजे से भरने में कामयाब हो जाते। किसानों को पानी देकर देश के चेहरे पर पानी लाया जा सकता था या है। पर अफसोस कि पिछले 66 वर्षों में वह ऐसा करने में कामयाब नहीं रही।कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि सब ऐसा जाहिर करते नजर आ रहे हैं, मानो उन्हें पता ही नहीं कि प्रधानमन्त्री और वित्त मंत्री और अंततः कांग्रेस हाथ पर हाथ धरे बैठी क्यों है, या वह ऐसी नादानी कैसे कर सकती है?
कांग्रेस को नादान मानने की इस भूल या चतुराई के ही माने निकालने की जरूरत है। यह कार्य कठिन नहीं तो आसान भी नहीं।
आइये हम विपक्षियों, सहयोगियों, समीक्षकों आदि द्वारा कांग्रेस को नादान मानने के कुछ और तथ्यों का जिक्र करें। सामान्य रूप से तो यही कि राजकोषीय घाटे और डॉलर से पिटते रुपए और अंततोगत्वा सुरसे-सी मुंह फैलाती महंगाई के इस दौर में कांग्रेस आखिर क्या करेगी? खाद्य-सुरक्षा के लिए धन कहाँ से जुटाएगी? इस कोशिश में करदाताओं के ऊपर प्रतिवर्ष 1,25,000 लाख करोड़ का बोझ आएगा। और यह खर्च बढ़ता ही जाएगा। भारतीय उद्योग परिसंघ के अध्यक्ष कृष गोपालकृष्णन इसे गहरी चिंता का विषय बताते हैं–इतना बड़ा खर्च, इस समय, राजकोषीय घाटे पर निश्चित ही भयानक दुष्परिणाम पैदा करेगा।
तो क्या हम यह मानकर चलें कि देश को अनुदान (सब्सिडी) देने की नीति से अलग लीक पर डालने और मुक्त बाजार व उदारीकरण का रास्ता दिखलाने वाले मनमोहन जी को इन तथ्यों का पता नहीं?
मैं ऐसी नादानी नहीं करना चाहता। गरीबी हटाओ का नारा बुलंद करनेवाली इस पार्टी की ‘गरीबी के फायदे’ की समझ पर संदेह करना ईशनिंदा जैसा है। जब इंदिरा जी ने यह नारा बुलंद किया होगा तब उनसे ज्यादा आश्वस्त शायद ही कोई और हो कि यह कभी संभव नहीं, लेकिन उन्होंने गरीबों की उपस्थिति की ताकत समझी। उन्हें बहलाया। अब तो इनकी ताकत और बढ़ी है। इनकी संख्या बढ़ी है, इन तक पहुंचना आसन हुआ है, चुनाव सुधारों के कारण ये वोट डालने के लिए बड़ी संख्या में बूथ तक पहुँच रहे हैं। तो ये जिसे चाहें उसे सत्तानासीन कर दें। इन्हें राम-रहीम नहीं,  रोटी चाहिए। यहाँ मुझे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता ‘पोस्टमार्टम की रिपोर्ट’ याद आती है–
गोली खाकरएक के मुँह से निकला -’राम’।
दूसरे के मुँह से निकला-’माओ’।
लेकिन तीसरे के मुंह से निकला-’आलू’।
पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है कि पहले दो के पेट भरे हुए थे।
लेकिन गरीब के मुंह से आलू शब्द फूट पड़े इसके लिए जरूरी है कि उनके लिए आलू सुलभ न रह जाए। मनरेगा ने चाहे-अनचाहे इन्हें थोड़ी शक्ति तो खरीद की दे ही दी है! तमाम धांधलियों के बावजूद। और इस स्कीम के लिए कांग्रेस को एक बार सत्ता इन गरीबों ने दे दी है, अब पुरानी स्कीम के लिए ये बूथ तक नहीं आने वाले। तो कांग्रेस यह जानती है, आपको पता हो न हो! उन्हें पता है कि कम में जीने की कला विकसित कर चुके गरीबों का जीना मुहाल करने के लिए महंगाई से अधिक कारगर हथियार और कुछ हो नहीं सकता। महंगाई डायन चीजों को इनकी पहुँच से इतना दूर कर देती है कि वे उन्हें चाँद सरीखा दिखने लगता है। फिर ऐसी ही स्थितियों में इन्हें 1 रुपए किलो बाजरा दे दो तो ये गरीब आपको अपनी गुलामी लिख दें, एक वोट क्या चीज है!
अब आप समझ रहे होंगे कि मरनासन्न रुपए और कमरतोड़ महंगाई कांग्रेस के लिए क्यों जरूरी हैं। क्यों यह इन स्थितियों को मूक दर्शक बनकर मुंह फैलता हुआ देखती नजर आती है। यसवंत जी कांग्रेस कोई नादानी नहीं कर रही। उसे अच्छी तरह पता है कि वह क्या कर रही है। आप नादान न बनिए। आप विपक्ष के नेता हैं, ऐसी साजिशों का पर्दाफास कीजिए। आपकी चुनौती(बहकाबे) पर कांग्रेस चुनाव नहीं करवाने वाली। सत्ता का पूरा स्वाद भोगकर ही यह सरकार चुनाव में उतरेगी। आप जैसे नेता और उनकी पार्टियाँ जाने-अनजाने इस साजिश में शरीक होकर अपनी बाजी शुरू होने से पहले ही हार चुके हैं। जाहिर है, आपको भी हमारी या कहें कि देश की चिंता नहीं है। तो ऐसे में विश्वसनीय मतदाताओं के लिए खाद्य-सुरक्षा और अपने लिए भ्रष्टाचार-सुरक्षा की कोशिशों का बुरा मानने की जरूरत नहीं, इनसे सीख लेने की जरूरत है। इसलिए मुरलीमनोहर जी! मुलायम जी! और अन्य तमाम जी! राजनीति के गुर सीखने में गुरेज मत करिए। कांग्रेस इसके लिए सबसे अच्छी कोचिंग दे सकता है।

खामियाजा भुगतता लोकतंत्र

समय इतिहास के पन्ने पर निष्ठुरतापूर्वक, ठहर-ठहरकर और बलपूर्वक गढ़ता है अपने शब्द और विडंबना हमारी चढ़ी त्योरियों की चिंता नहीं करती!
एक लड़की सामूहिक बलात्कार का शिकार होगी और आप मुम्बई को लेकर चिंतित होते हुए उसकी यंत्रणा पर दया दिखलायेंगे, उसके भविष्य की चिंता करेंगे कि अचानक लड़की आपको यह कहकर आइना दिखला देगी कि जिन्दगी यहीं खत्म नहीं होती। वह ठीक होकर जल्द से जल्द ऑफिस ज्वाइन करना चाहती है। समय ये शब्द दर्ज करेगा क्योंकि वह बहादुरों को तरजीह देता आया है। दूसरी ओर, नेता प्रतिपक्ष (लोकसभा) संसद में बलात्कार के दोषियों के लिए मृत्यु की सजा मांगेगी पर उनकी सहयोगी नेत्री एक नाबालिग के आरोपों को ही संदेह की नजर से देखती नजर आएँगी। इनके और कुछ सहयोगी एक कदम आगे निकलकर आरोपित व्यक्ति आसाराम के समर्थन में खुलेआम अजर आयेंगे। यही विडंबना है।
इस विडंबना ने मीडिया को वाद-विवाद के नाम पर मजमा लगाने की इच्छित छूट दे दी है। यहाँ ‘पढ़े-लिखे’ लोग अपने पूर्वग्रह आरोपित करेंगे। आम आदमी क्या सोच रहा है इसकी चिंता कोई नहीं करेगा। इनके लिए ऐसा करना संभव नहीं होगा क्योंकि ये उन्हें नहीं पहचानते, क्योंकि ऐसा करना उनके व्यावसायिक हितों के लिए जरूरी नहीं है। जाहिर है, ये वाद-विवाद इतिहास का हिस्सा बनने की क़ाबलियत नहीं रखते। आपकी बातें इन पन्नों पर तभी अंकित होंगी जब या तो आप राजा के दरबार में हों या प्रजा के बीच। बीच वालों की बात अनसुनी रह जाती है।
अब ऐसे में हम कैसे जाने की आम आदमी आज नेताओं के पालों के बारे में क्या सोच रहा है? चाहे वह खाद्य-सुरक्षा हो या बलात्कार पर न्याय के स्वरूप का मुद्दा और उसपर नेताओं का खेमा। विडंबना यह है कि जब हम ग्लोबल होते जा रहे हैं हमें पड़ोसियों की खबर नहीं लगती। बगल वाली फ्लैट में महीनों तक भूखी रहकर एक महिला मर जाती है और हमें खबर नहीं लगती।
यह व्याकुल कर देनेवाली स्थिति है! आम आदमी क्या सोच रहा है यह हमें पता ही नहीं! इसी के साथ यह भी तय है की हमें यह भी नहीं पता कि वह कब कैसे सोचता है। क्या यही वजह है की वह तथाकथित राजनीतिक पंडितों को चौंकाता है। और चौंकाए जाने की मजबूरी में ये इन्हें बुद्धिमान बताते हैं जबकि प्रायः दैनंदिन जीवन में इन्हें मूर्ख मानते हैं? क्या यही वजह हैं कि लाखों करोड़ों के घोटाले करनेवाली सरकार खाद्य-सुरक्षा का ‘ड्रामा’ करती है? आपकी जेब में कुछ को खिलाने के पैसे न हों और आप करोड़ों को सपने दिखाएँ तो समय ठहर कर देखेगा और तब लिखेगा। विडंबना आपको ऐन मौके पर अस्पताल पहुंचाएगी। हम उनके स्वस्थ्य की कामना करेंगे पर खामियाजा देश का लोकतंत्र भोगेगा।
इन पंक्तियों को लिखते समय ठीक इसी वक़्त मुझे वर्ष 1996 के मध्य अटल बिहारी वाजपेयी की एक गूंजती पंक्ति याद आ रही है जो उन्होंने तमाम पार्टियों को आगाह करते हुए कहा था जब वे साम्प्रदायिकता के नाम पर भाजपा को अस्पृश्य मानकर उन्हें संसद में पदच्युत करने के लिए वोट करने वाले थे। उन्होंने प्रायः कहा था कि तमाम पार्टियों की ऐसी एकांगी सोच का खामियाजा देश का लोकतंत्र भुगतेगा।
और सच पूछें तो आज उनकी बातों का सही माने समझ में आ रहा है। माने तब समझ में नहीं आया जब बाटला हाउस में आतंकवादियों की गोली से शहीद इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की शहादत के समय सोनिया जी और दिग्विजय जी का मन इस एनकाउंटर में मारे गए इंडियन मुजाहिदीन के आतंकी आतिफ अमिन और मोहमद साजिद के लिए व्याकुल हुआ था। माने तब भी समझ में नहीं आया जब दिग्विजय जी ने ओसामा बिन लादेन और हाफिज सईद को श्रीमान और जी के उपसर्ग और प्रत्यय प्रदान किये। माने तब भी समझ में नहीं आया जब आतंकवाद को भगवा रंग प्रदान किया गया। जबकि खून के सुर्ख रंग को देखने में बरता जा रहा पूर्वग्रह और उसके दूरगामी परिणामों पर ध्यान जाना चाहिए था। लखनऊ में जब शिया-सुन्नी लड़ रहे थे, सड़कों पर खून बह रहा था तब राज्य सरकार चुप रही पर दुर्गा शक्ति नागपाल को निलंबित करने के लिए सांप्रदायिक तनाव की आशंका को ही महत्वपूर्ण माना। इस वक़्त भी मेरे सामने वाजपेयी जी के शब्दों का गहरा निहितार्थ खुलकर प्रकट नहीं हुआ था।
लेकिन अब जब आसाराम के समर्थन में भाजपा खुलकर सामने आ गयी है, मुझे ‘लोकतंत्र का खामियाजा’ वाक्यांश का अर्थ खुलकर समझ में आ रहा है। खून के रंग को वोट के चश्मे से देखने का असर अब बरपा है! इस चश्मे की बदौलत यदि आप आतंकवादियों के मारे जाने पर रो सकते हैं तो उसी खास तरह के चश्मे से आसाराम को क्यों नहीं देखा जा सकता है। यह चश्मा अब बहुतायत में उपलब्ध है। हर कोई ले सकता है, पहन सकता है। वह जमाना गया कि टेलीफ़ोन का चोगा खास घरों की शोभा बढ़ाता था। अब तो जमाना मोबाइल है। अब यह चश्मा बड़ी संख्या में लोग पहने हुए हैं। इन चश्मों को पहने एक खास पाले के लोग सोच रहे हैं कि आखिर 80 फीसदी लोगों का राजनीतिक भविष्य 20 फीसदी लोगों की एकजुटता क्यों तय करे? इनकी संख्या यदि बढती चली गयी तो हम पता नहीं कौन सी स्थिति देश में देखने वाले हैं! क्या हमारे पास संभलने का वक़्त बचा है? काश हो और नेता इसे जरूरी समझें।
कहते हैं कि क़ानून अंधा होता है, उसे होना भी चाहिए, क्योकि यदि वह खून का रंग देखने का वर्त्तमान नेताओं-पार्टियों का चलन चला दे तो बड़ी आफत हो जाएगी। शुक्र है ऐसा नहीं है पर जहाँ जितना भी है यह चलन, लोकतंत्र को मर्माहत करने को काफी है।

तो समझिये चुनाव होने ही वाला है

स्कूली दिनों में भारत के संविधान की भूमिका के कुछ शब्द सायास याद रखने होते थे जो भारत को संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, प्रजातांत्रिक गणराज्य निश्चित करता था। वह लोगों के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक न्याय, अभिव्यक्ति, विश्वास आदि की स्वतंत्रता की दुहाई भी देता था। अब उन शब्दों को दोबारा पढ़े अरसा गुजर गया है। इन शब्दों के संविधान में अंकन को तो 63 साल बीत गए। इन शब्दों में निहित भावना देश में हर तरफ और हर रोज बेपर्दा होती रहती है। कौन इसे याद करता है लेकिन…धन्य हैं देश के नेता, खास कर गद्दीनसीन कि उन्हें चुनाव के निकट आते ही ये शब्द खूब याद आने लगते हैं।
इससे बड़ी सुभीता हो जाती है। चुनाव आयोग को बताना भी नहीं पड़ता और हम जान जाते हैं कि चुनाव का महापर्व (गोया हमारी तो जान सांसत में आ जाती है) बेहद करीब आ गया है।
अब संप्रभुता को ही लीजिये–अभी तक तो यही हो रहा था कि 9/11 के बाद किसी भी तरह की बातचीत से इनकार के बाद पाकिस्तान से बातचीत की पहल हमही करते थे। हमारी धरती पर घुस कर हमारे जवानों के सिर काटकर ले जानेवाले, गोलियों से छलनी कर देने वाले पाकिस्तानी फ़ौज को हमारे रक्षामंत्री संसद में दुश्मनों को दूध का धुला साबित करते नजर आ रहे थे। चीन हमें आँख दिखा रहा था तो हम खिखियाते नजर आ रहे थे। वह हमें धमकाता था तो हम उनकी प्रसंशा करते थे। मतलब– चुनाव अभी दूर था। आप कहेंगे–लेकिन चुनाव तो ज्यादा से ज्यादा अपने नियत समय पर होंगे ही? हाँ, वो तो है! तभी तो विपक्षियों में देशप्रेम का स्वर फूट पड़ा है। नहीं तो क्यों है कि चीन हमारे बंकर ध्वस्त करके चला जाता है और ये चुप रहते हैं पर अभी एक निगरानी कैमरा तोड़ ले जाने वाला चीन अचानक देश के लिए खतरा बन गया है। लेकिन मैं जो कह रहा हूँ वह ये की जब लद्दाख में हर्कुलस सुपर विमान अचानक उतारा जाये तो समझो चुनाव सचमुच निकट है। इसे हमारी सरकार का इशारा माना जाये। बहरहाल संप्रभुता के मसले पर ऐसे अन्य संकेतों को पहचानने की पहेली अब आप सुलझाएं।
अब लीजिये समाजवाद–इसे लाने की खातिर पूर्ण-अपूर्ण-सम्पूर्ण कितने ही प्रयास हुए जिसे क्रांति तक का नाम दिया गया। इसके छिटपुट प्रयासों की चेष्टा (मुकम्मल कोशिश नहीं) चलती ही रहती है। चूँकि अब महंगाई डायन और भ्रष्टाचार राक्षस इस समाजवाद की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है और विपक्षियों के लिए उसका विरोध करना ज्यादा सुविधाजनक है तो उसके लिए भी समाजवाद कोई मुद्दा नहीं। इस नाम से बनी-जुडी पार्टियों तक के लिए इसके माने बदल गए हैं। ऐसे में यदि सरकार एक दिन अकबका कर देश के करोड़ों भूखों-नंगों-शोषितों के लिए द्रवित नजर आने लगे तो समझिये चुनाव बेहद निकट है।
और अब धर्मनिरपेक्षता–यह किसे नहीं पता कि दूसरे धर्म के लोग भी हमारे साथ ही रहते हैं और हम उनके साथ। पर जब लाल किले से प्रधानमंत्री हम नासमझों को सद्भाव का पाठ पढ़ाने लगें, हमें धर्मनिरपेक्षता-साम्प्रदायिकता-छद्म-धर्मनिरपेक्षता के अर्थ बताने की फिर से कोशिशें होने लगें,अल्पसंख्यक समुदाय के बाहुल्य से घिरे बहुसंख्यक और इसकी उलट स्थितियों में रह रहे ‘अल्पसंख्यकों’ के चेहरों पर भय मिश्रित चुप्पी और खिसियाहट दिखने लगे, जब साधु-संतों की भीड़ को नेतृत्व देने के लिए नेतागण आगे आने लगें तो समझिए चुनाव आपके दरवाजे पर दस्तक दे रहा है।
प्रजातंत्र की बाबत मैं ऐसा नहीं कह पाता जैसा कि ऊपर कहा। इसकी याद हमें हमेशा दिलाई जाती है। इसे किसी षड़यंत्र की तरह हमपर थोपा जाता है। सत्तापक्ष अपनी ढिठाई और निरंकुशता को इसकी आड़ में छुपाता है। वरना प्रजातंत्र के इन रक्षकों की नाकामियों से आज़िज आकर जब सर्वोच्च न्यायालय कुछ बोलता है तो इनकी सत्ता खतरे में क्यों पर जाती है? भारतीय राजनीति में प्रजातंत्र ने जितने पाप अपने सिर पर ढोए हैं उतने तो निरंकुश कई तानाशाहों के शासन ने भी नहीं ढोए हों। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र (जनसँख्या के लिहाज से, वर्ना जनसँख्या कौन सा कभी वरदान साबित होता है) में हर वक़्त नेताओं को यह बताना पड़े की यहाँ लोकतंत्र है, मुझे चिंता का विषय लगता है। इसलिए नेताओं द्वारा इनके प्रयोग से आप चुनाव को लेकर कोई आशय न निकालें तो अच्छा लेकिन यदि किसी कद्दावर नेता विशेष को छोटा बताने की प्रवृति में जुटे नेता अचानक उसे अलोकतांत्रिक, निरंकुश प्रवृत्ति वाला बताने लगे तो उसके आशय निकलने की जरूरत है…

भारत के निर्माण पर आपका नहीं हक!

भारत के निर्माण पर जब कांग्रेस ने हक जता दिया है तब कोई और देश के निर्माण की जिम्मेदारी अपनी न समझे! आजादी के अभी सात दशक ही तो पूरे होने वाले हैं। एक आदमी जो आजाद पैदा हुआ, वह तो अभी 70 साल का भी नहीं हुआ है। वह अकेला आदमी कितना बदलेगा कई सौ साल से लुटे-पिटे देश को! अभी हमें मीलों चलना है। हमें राह मत दिखाओ, पीछे-पीछे आओ! इसे मेरा हक मानो!
तुम देश का मध्यवर्ग हो– तुम पिटते रुपये, चढ़ती महंगाई, गर्दन पर नौकरी से छंटनी की रखी धारदार छुरी की चिंता करो, कहाँ इस पचड़े में पड़ते हो? यह पूछना तुम्हारा काम नहीं है कि करोड़ों गरीबों की खाद्य-सुरक्षा का स्वप्न बीती रात को ही हमें क्यों आया या हम ऐसा करने के लिए धन कहाँ से लाएंगे! तुम देश के किसान हो, उपजाओ। जो बिक जाये बेच लो, खा सको खा लो। बाकी हमारे पास सड़ने के लिए छोड़ दो।
पर सवाल इस तेवर मात्र का नहीं है। कांग्रेस खाद्य-सुरक्षा के मसले पर जैसा रुख अपना रही है उससे लगता है वह भाजपा सहित अन्य कई पार्टियों को कह रही है–’तुम विपक्षी हो, तुम हमारा समर्थन क्यों कर रहे हो? भारत के निर्माण पर तो हक है मेरा!’
बहरहाल यह पार्टियों की समस्या है। हम तो सिर्फ इतना जानना चाहते हैं कि मुफ्त अनाज के लिए धन कहाँ से आएगा? वह आ भी गया तो जिन्हें वह सामग्री मिलेगी वे अब भूखे नहीं सोयेंगे तो फिर अगली सुबह रोजगार के लिए कहाँ जायेंगे? यदि उन्हें रोजगार नहीं मिला तो वे क्या-क्या करेंगे? चलिए हम मान लें कि यह उनकी समस्या होगी तो हमें हमारी समस्याओं से निजात दिलाने का क्या उपाय करेंगे?
एक बार किसान प्याज ढंग से उपजा ले या वर्षा रानी की कृपा से उपज जाए तो उसका मूल्य इतना गिर जाता है, मांग-आपूर्ति का ग्राफ ऐसा बनता है की किसान जार-जार रोता है। अगले साल वह कम उपजाता है और बिचौलिए प्याज को ’80′ रुपए किलो बेच हम सबको रुलाते हैं। विडंबना यह कि किसान तब भी फायदे का हकदार नहीं बनता। अब जब सरकार गरीबों के लिए अनाज खरीदेगी तो किसान जाहिर तौर पर चावल और गेहूं उपजाने पर ही अधिक ध्यान देगा। अब हम दलहन की मांग भर आपूर्ति करने में असफल होंगे। सब्जियों का यही हाल होगा। आयत की राह जायेंगे तो कीमतें आसमान छुएंगी। पहुँच से बाहर! अब इसके लिए सरकार क्या करने जा रही है?
इतना ही नहीं। कई राज्यों में जहाँ ऐसी योजना अमल में है और केंद्र की योजना से अधिक अनाज सस्ते में दे रही है और जो पर्याप्त नहीं है वहीँ उससे भी कम अनाज देने की योजना कहीं एक साजिश तो नहीं? कैसे? आज भाजपा शासित जिन राज्यों में 35 किलो अनाज मिल रहा है उन्हें अब सब की तरह 25 किलो मिलेगा। चूँकि यह लाभ उन्हें राज्य सरकारें दे रही थी तो वे उन्हें वोट देते हैं या देने की सोच रहे हैं। अब उनकी नाराजगी भी राज्य सरकार ही झेलेगी। केंद्र की खाद्य-सुरक्षा योजना से जो नए लाभार्थी जुड़ेंगे वे इतने में ही खुद को 2014 चुनाव तक तो तृप्त पाएंगे ही! यानी उनका थोक वोट! अलोकप्रियता के गर्त में डूबती पार्टी को इससे अच्छा सहारा और क्या होगा। इस खाद्य-सुरक्षा की लाठी से सांप भी मर जयेगा और लाठी भी नहीं टूटेगी!
यदि इस योजना में कोई साजिश नहीं, और यह सोनिया जी की रातोरात उमड़ आई गहरी ममता का सच्चा प्रसाद है तो कोई बताएगा कि आज तक भूखों मरता गरीब मुक्त बाजार से बचे अनाज और नमक-मिर्च की महँगी खरीद करने में कैसे सक्षम होगा? क्या महंगाई पर रोकथाम के प्रति कोई ठोस योजना आपके पास है?

Sunday, August 2, 2009

ऒ प्रेमहि छल...!

प्रातः केर स्वर्णिम आभा मे
पटिया पर सरिया कऽ राखल
तानपूरा, हारमॊनियम आ तबला-डुग्गीक मध्य
अहाँक कॊरा मे फहराइत
कापीक पन्ना
आ एमहर-ओमहर छिरिआयल
हमर किछु शब्द
अहाँक आँखि मे सेतु
बनयबाक प्रयास कर रहल छल
आ अहाँ खिड़की सँऽ बाहर
विद्यापीठ दिस देख रहल छलहुँ
कि हम आयल रही ....,

एकटा पिआसल दुपहरियाक एकांत मे
वाद्ययंत्रक मिश्रित तान मे
हमर शब्द सभ केँ बहुत सेहंता सँऽ
अपन ठॊर पर अहाँ रखनहि छलहुँ
कि हम आयल रही ....,

पुनः
एकटा श्यामवर्णी साँझ मे
दीप केर ज्यॊति किछु कहि उठल छल
कि अहाँक ठॊर पर तखने
हम अंकित कऽ देने रही
वाद्ययंत्र सँऽ निकसल मिश्रित संगीत
आ देखलहुँ
अहाँक आरक्त नेत्र मे
आ अहाँक गाल पर नचैत
अप्रतिम धुन
कि हम आयल रही !..,..

ऒ प्रेमहि छल...!

हम जी रहल छी

धानक दूध भारी आ ठॊस ह्वैत रहलै
आ शीत संग हौले-हौले बहैत रहलै
समय आ व्याकुल मॊन
आ आँखिक सॊझाँ
रिक्त हॊइत रहलै खेत
आ भरैत रहलै खरिहान
गॊहूम सँऽ
आ पुनः जलमग्न हॊइत रहलै
अहाँक अत्यंत मनॊहरताक परिपार्श्व मे
ई आँखि
गेंदा, तीरा, सिंगरहार आ थलकमल
लुटाइत देखैत रहलै
खसैत रहलै कओखन अहाँक फूलडाली सँऽ तऽ
कओखन अहाँक आँचर सँऽ
हमर आँखि
छॊट-पैघ यात्रा करैत रहलै
अहाँक अत्यंत मद्धिम मनॊहरताक परिपार्श्व मे
अनुखन नव पाँखि लगा उड़ैत रहलै
ई आँखि
छाती मे नेने एकटा गाम, एकटा धार, एकटा माय
थान तर केर जाड़क भॊर
बदलल आकास मे
दृश्य बदलैत रहलै
मुदा अहाँक अत्यंत मद्धिम मनॊहरताक परिपार्श्व मे
लसैक कऽ ठमकल छै
छॊट-छॊट कालक एकटा
कॊंढफट्टू दृश्यालॊक....,
हम जी रहल छी...!?...

तॊरा मे हम

तॊँ कत्तऽ छैँ बहिन !
कत्त रहबेँ काल्हि साँझ
तखन जखन
सुरुज घर मे घुसि
भीतर सँऽ लगाबक ओरियान मे रहतै
अपन दरबज्जा ?
हम तॊरा छूबि कऽ
देखऽ चाहबौ जे कतेक रास बचल छी
एखनॊ हम तॊरा मे
जखन कनेके काल बाद
हॊमऽ वला हेतै राति घनघॊर !....

जतऽ रहैत छैक लौलसा ओकर

अहाँकेँ लगैत अछि
जखन
कि हम अंतः छी कत्तहु
तखन
हम रहैत छी
अहीँक आँचर तऽर
झलफलाइत दीप सन
जैरत आ आलॊकित हॊइत
स्नेहक आधिक्य आ
ढबकैत इच्छाक उछाह सँऽ

अहाँकेँ
बूझक चाही
जे लॊक सदिखन रहैत छै
ओत्तहि जतऽ
रहैत छैक लौलसा ओकर !

एकांत मे अहाँ

बेर बेर...
बेर बेर हमर चेतना मे अहाँ आबि जाइत छी
गीतक टेक जॊकाँ
मॊन रहैत छी
जीवित हमरा ठॊर पर...

अहाँ प्रायः हरेक बेर, हरेक समय
देखैत रहैत छी हमरा
ढरकल आँचर
की करी... की करी जे...
कौखन तानपूराक खुट्टी मे
लसकि
तँऽ कौखन हरमुनियाँक तर मे दबि
उघार करैत रहैत अछि
हमरा... प्रिय !
अहाँक नजरि
निविड़ एकांत मे
लजा दैछ...
एम्हर विस्मय सदिखन
पछॊड़ धयने रहैछ हमर
ओत्तहु जतय अहाँ
नहियॊ रहैत छी सद्यः
हम किएक आँचर सरिया लैत छी
साकांक्ष भऽ... बेर बेर... कियै...!

Thursday, June 18, 2009

रहैत छी अहीं मात्र रूप बदलि कऽ

नीक जॊकाँ पर्दा सँऽ घेरल
वातानुकूलित डिब्बा मे
यात्रा
दूरी मे नहि
समय मे कटैत छै
दू विपरीत दिशा मे
पड़ाइत विभिन्न संयॊग-वियॊगक
झलफलाइत स्मृतिकण सँऽ बनल
अमूर्त पटरी पर
खिड़की सँऽ बाहिरक बन्न दुनियाक केबाड़
फुजबाक कॊनॊ उपाय नहि देख
खुलि जाइत छैक
मॊनक गह्वर
पबैत छिएक
ओहि मे
रहैत छी
अहीं मात्र
रूप बदलि कऽ
नव-नव
मानॊ अन्हार कक्ष मे
जरैत एसगर दीप
केर बातीक लौ
लहराइत हॊ
अहांक आँचरक हवा सँऽ
आ अहाँक स्मृति मे
थरथराइत हॊ
पीपरक सहस्र पात
ओहि गह्वरक रक्तरंजित
देबाड़ पर
प्रेमक विस्मयकारी
स्तंभित अवकाश आ विछॊहक निर्मम
दुराग्रही क्रियाशीलता बनि कऽ

Friday, May 29, 2009

एहि संजॊग सँऽ हम करैत छी प्रेम

एकटा एहेन समय मे
जखन स्वयं ई समय
सबसे पैघ चिन्ता हॊ सबहिक
हम अपन भाषाक मादे
अपस्यांत छी

फिकिर करैत छी
अपना पर खसैत
प्रश्नक ओहि फुहारक
जे केओ आखिर
किएक लिखैत छै
कविता ओहि भाषा मे
जेकर पाठकक संख्या
विश्व में शायत
सबसे कम छैक ?

आ हम एहि प्रश्नक उत्तर
नहि देबा लेल
कृतसंकल्प छी हुनका
जनिक तर्कसंपन्न विभ्रमित दिमाग मे
ई प्रश्न लहराइत छैन
कॊनॊ विजयपताका-सदृश

मुदा मऽन में जवाब तऽ
उठिते छैक

समयिक धकिआयल
हऽम
सौभाग्यवश सटल छी
प्रेमक गिलेबा सँऽ चुनायल
विश्वास-विचारक मजगूत
देबार सँऽ
हमरा भेटल अछि सहारा
आ जे की हमरा हाथ मे
नहि छल
आ ने हमरा माइक हाथ मे
आ नहिए हमर नानी आ
नानीक नानी केँ हाथ मे
जे ओ चुनि सकितै
अपन मातृभाषा
आ विद्यापति केँ अपन कविश्रेष्ठ
ई एकटा संजॊग छल
आ एहि संजॊग सँऽ
हम करैत छी प्रेम
आ लॊक ईष्या

कॊनॊ भाषा नहि चुनैत छै
अपन कवि आ अपन भाषा-भाषी
आ कॊनॊ भाषाक क्षमता
तय नहि करैत छै समय

ओ तऽ कविक कान्ह पर पड़ल छै
ठॊस जिम्मेदारी बनिके
एहि अतिसुंदर संजॊगक
की हम मैथिल छी

आ जाहि पहिचानक बिना
काज तऽ चलै छै
मुदा तहिना जेना
एहि देशक सत्तैर प्रतिशत
जनताक काज चलैत छै
20 टका रॊज कमा क‍ऽ

Tuesday, May 26, 2009

कहियॊ गलती सँऽ

कहियॊ गलती सँऽ
सौभाग्य की दुर्भाग्य सँऽ
देख लैत छी साँझ
शहर मे
तऽ नहि रहल हॊइत अछि
शहर मे

मऽन पड़ैत अछि
गामक मुनहारि साँझ
आ भगवती घर से
बहराइत काकी
आँचरक ओट में लेने दीप
आ नहुँए-नहुँए आङनक दॊसर कॊन धरि
जाइत तुलसी चौरा लग
ठॊढ़ पटपटबैत
आ जे की बाद मे बुझलिअय
करैत छल हमरे सबहिक उन्नतिक कामना

तहिना कहियॊ गलती सँऽ
सौभाग्य की दुर्भाग्य सँऽ
देख लैत छी भॊर
शहर मे
तऽ नहि रहल हॊइत अछि
शहर मे

मऽन पड़ैत अछि्
गामक साकांक्ष भॊर
चापाकऽल पर घऽरक समस्त
बरतन-बासन मांजैत माइ
कऽल चलबैत काकी
अंङना नीपैत बड़की बहीन
तत्परता सँऽ
चूल्हा पजारैत छॊटकी
आ जे की बाद मे बुझलिअय
करैत छल हमरे जलखइक तैयारी
ओकरा सबकेँ नहि छलैक अपन कॊनॊ फिकिर
आ एम्हर
जखन हम शहर मे रहैत छी
देवलॊक सँऽ हमर माइ आ काकी
तऽ कॊनॊ-कॊनॊ गामक संघर्षलॊक सँऽ
हमर बहीन सब
सतत करैत रहैत अछि हमर कुशलक कामना
बूझल अछि हमरा

फेर कहियॊ गलती सँऽ
सौभाग्य की दुर्भाग्य सँऽ
देख लैत छी दुपहरिया
शहर मे
तऽ नहि रहल हॊइत अछि
शहर मे

मऽन पड़ैत अछि्
गामक प्रचंड रौद आ अटट्ट दुपहरिया
ओहि काल कतहु सँऽ
हहायल-फुहायल घुरैत बाबाक
मुँह सँऽ झहरैत चन्दा झा केर
पाँति - अरे बाबा दावानल सदृश लंका जड़ैये
आ हम बहीन आ माइक आँखि बचा के
निकलि जाइत रही लंका मिझबऽ लेल
आ उमकी धार मे ताधरि
जाधरि आँखि
लाल नहि भऽ जाइत छल
अरहुल फूल सन
तखन
मन पड़ैत छल माइ
जे करैत हॊयत चिन्ता
जॊहैत हॊयत गाम पर बाट
आ जखन
हम जायब अंङना
तऽ ओ तमसा कऽ खसि पड़त पैर पर हमर
आ जे की बाद मे बुझलिअय
ओकर एहन उनटल प्रतिक्रिया
हमर जीवैत रहबाक कामना छल

आ राति तऽ
सब दिन देखते छी शहर मे
वस्तुतः शहरक मतलब
रातिए हॊइत अछि
शायद
एहन राति
जाहि मे
तरेगन नहि हॊइत छैक
स्याह आकाश सेहॊ नहि

कहियॊ शहरक रातिक आकाश
भरि पॊख देखू त‍ऽ सही
बुझायत शहर माने
की हॊइत छैक

तखन मऽन पड़त
अहूँ केँ अपन गाम
फूल-पात, खेत-खरिहान,
मऽन पड़त अपन बाध-बऽन
आ ओहि मे
तीन तनुक बाती पर टांङल
खढ़क खॊपड़ि
ओकर मुँह पर भुकभुक जड़ैत-मिझाइत डिबिया
आ ओकर महत्व

Thursday, May 21, 2009

मऽन मे सदिखन रहैत छी अहां

मऽन मे सदिखन
रहैत छी अहां
हे कविता

जेना जीवनक लौलसा हॊ
मृत्युशय्या पर पड़ल
कॊनॊ व्यक्तिक करेज मे

जेना मुक्तिक उजास
अनुकूल समयिक फिराक बनि
नुकायल हॊ कॊनॊ कैदीक अन्हार मे

मुदा हम की करी
जे एकटा एहन समय मे
जखन टूटि कऽ खसि रहल छै
एक-एक टा पात विवेक-विचारक
टूटि-भाङि रहल छै एक-एकटा डाढ़ि
परंपरा-विश्वासक एहि पतझड़ि मे
बसात बड़ तेज बहैत छै
तखन
हम रहै नहि पबैत छी
समयिक वर्तमान प्रवाह मे
डूमैत-उपराइत
आ नहिए रहि पबैत छी
ओहि मे हाथ धॊबा लेबा लेल तत्पर
आ चलि अबैत छी
बहुत पाछू
ओहि समय मे
जकरा बादहिँ सँऽ
सबकिछु बहुत तेजी सँऽ
लगलै बदलऽ
संघनक केर युक्तिक लय-ताल पर नचैत
हम देखलिए
जे जखन सौंसे दुनिया के
लागल रहै
एकमात्र चिन्ता
जे कॊना रमौने रहतै कंप्यूटर
अपन असंख्य अधुनातन प्रशंसक केँ
अपन वर्चुअल दुनिया में
के-2 केर मध्यरात्रिक पश्चात
की तखन हमर माय
संघर्ष करैत छलीह
भरि पॊख सांस भरि
लेबा लेल अपन छाती मे

आ जखन 2000 केर
31 दिसंबरक
अंतिम मिनट खत्म हॊइत-हॊइत
भरि पॊख सांस भरि देलकै
सौँसे दुनियाक कंप्यूटरप्रेमी लॊकनिक
छाती मे गौरवक
की हम हैंग भऽ गेल रही

हमर माइ असमर्थ भऽ गेल छल
अपन बीमार फेफड़ा सँऽ
खींच सकबा में,
आ ओहिमे भरि सकबा में
ओकर एक कॊन भरि सांस
एकटा एहन समय मे
जखन गणितक
असंख्य जॊड़-घटावक बल पर
लॊक कऽ सकैत अछि किछुओ
बना सकैत अछि
रॊबॊट केँ द्रॊणाचार्य
आ जे की तय छै
आब आवश्यकता नहि पड़तै
बालकक उपनयन केर
नहि रहतै गरु-शिष्य परंपरा
छौ ताग-तीन प्रवर
नहि जुटतै भौजी-काकी-मैयां
गाबऽ लेल शुभै हे शुभै
आ केओ नहि जेतीह
ब्रह्मक थान
आ बूढ़-पुरानक आंचर मे
नहि खसतै-समटेतै केश मुंडन केर
सुदीर्घ लॊक-परंपराक
नेटवर्क भाङि जेतै
अकस्मात सब लेल
बेसी महत्वपूर्ण भऽ जेतै
समुद्रक अतल गहराई मे लटकल
ऑप्टिकल फाइबरक मॊटका तार

लसकल रहतै सदिखन
हमर चिन्ता मे एकटा फांक बनिकऽ

आब आतंकवादी ओकरा नष्ट करबाक
करतै ओरियान
आ कंप्यूटर केर उपयॊग-उपभोग मे
इतराइत हम
बिन प्रयासहिँ नष्ट कऽ देबै
अपन असंख्य स्मृति-अपन असंख्य आख्यान

मुदा ईहॊ तय
जे कॊनॊ द्रॊणाचार्य
नहि काटि सकतै
कॊनॊ एकलव्यक औँठा

तेँ हम विरॊधी
नहि बनि सकबै
नव गति-नव संचारक

बस अफसॊस रहतै
एतबे
जे कहिया
एतेक कऽ लैबे प्रगति हमसब
जे कंट्रॊल-ऑल्ट-डीलीटक बटन के
बेर-बेर हौले-हौले दाबि
कऽ लेबै
अपन जिनगी केँ
रीस्टार्ट
जखन जरूरति पड़तै
बेर-बेखत
जखन केओ
तॊड़ि देतैय हृदय
आ हैंग भऽ जेतै जिनगी
तऽ बेर-बेर हौले-हौले दाबि उठबै
की पैडक कंट्रॊल-ऑल्ट-डीलीट बटन केँ हमसब
आ रीस्टार्ट कऽ लेबै
अपन ठमकल समय-ठमकल जिनगी
बेर-बेर रीफ्रेश करैत रहबै
माउस के राइट क्लिक करैत

मुदा तखनॊ
जेहन हॊ
हमर-अहांक दुनिया
हम हंसबै तऽ कविता बनतै
हम कनबै तऽ कविता बनतै
सतत करैत रहबै
प्रेम कविता सँऽ
आ सबहिक प्रेम
बनल रहतै
कविता सँऽ

एम्हर
एतबा धरि
अवश्य अछि विश्वास
जे ओकरा नहि पड़तै आवश्यकता
कॊनॊ कंट्रॊल-ऑल्ट-डीलीटक बटन केर
बेर-बेखत हौले-हौले
फूल सन कॊमल स्पर्शक
औनाइत, की प्रफुल्लित
मऽन मे
ओ बनैत रहतै
नव अवसर-नव विधानक
रूप-रेखा खींचैत

Monday, May 11, 2009

राति स्वप्न मे प्रिय !

राति स्वप्न मे
कविताक द्वि पाँतिक मध्य
अहाँक टिकुली आबि
हमरा आँखि मे
गरि गेल
आ गरिते चलि गेल
भीतर धरि
आ जे की हरदम भेलै अय
हमहुं ओकर पछॊर धयने
घसिटाइत चलि गेल छलहुँ
बहुत गहीँर धरि
एकटा अद्भुत लॊक देखलिअय

हमर ई पहिल अनुभव नहि थिक

एहन लॊक देख सकैत अछि
एकटा बताहे
आ एकटा बताहेक
करेज मे
सांस लऽ सकैत छै
एहन लॊक

एतय सबकिछु छलै

महानगर छलै
ओकर त्रास छलै
नगर छलै
ओकर घुटन छलै
गामॊ छलै ओकर महक सेहॊ छलै
ओ धार सेहॊ छलै
जे अपन सम्पूर्ण वैभवक संग
बहैत अछि
हमरा स्मृति मे
आ ताहि पर एकटा झलफल पर्दा छलै
अहाँक ललका ओढ़नी सऽन
आ जे की बाद मे बूझलिअय
ओ अहीँ छलहुं
हमर समस्त स्मृति केँ झँपने
अपना ओढ़नी सँऽ

हम आगू बढ़ि
बहुत दूर निकलि
आब अपना गाम
आबि दलान पर छलहुं ठाढ़
कि बसात सिहकै छलै
थलकमलक झमटगर गाछ पर
आ ओहि पर लटकल रहै
थॊकाक-थॊका फूल
आ सॊझाँ पॊखरि मे
कास छलै
एम्हर बड़की टा बास छलै
आ ओ सबकिछु छलै
जे समयिक झॊल सँ
अनवरत संघर्ष कऽ रहल छै
आ ओहि पर पुनः
एकटा लाल पर्दा छलै
आ जे की बाद मे बुझलिअय
ओ अहीँ छलहुँ
अहीँक ओढ़नी छलै ।

हम आगू
आबि अपन पिता लग
छलहुँ ठाढ़
जिनक माथा पर समयिक अद्भुत चित्रकारी छलै
हम सॊचिते रही
जे समय एकटा
अद्भुत चित्रकार अछि
आ की एकटा लाल पर्दा छलै
जाहि तऽर सँ
एक जॊड़ी पनिगर आस सँ भरल आँखि
हमरा हेरैत छल
आ ओहि दया पर
ओहि करुणा पर
एकटा लाल पर्दा छलै
आ जे की बाद मे बुझलिअय
ओ अहीँ छलहुँ
अहीँक ओढ़नी छलै ।

ई आँखि
हमर माइक थिक
जे हमर बाल्यकालहि सँऽ
हमरा लेल एहने अछि
कि हमर माइ
संभवतः बूझैत छथिह्न
जे एहि छौड़ाक आत्मा पर
पछिला जन्मक बॊझ छै
पापक
आ हमरा अपन माइक
एहि आँखि सँऽ
डर लगैत अछि
हम पसेना सँऽ भरि उठैत छी
आ रातियॊ ओहिना भेल
हम जागि उठलहुं
पसेना-पसेना भऽ
जे सबसे पहिने किछु मन पड़ल
ओ लाल ओढ़नी छल
आ जे की बाद मे बुझलिअय
ओ अहीँ छलहुँ
अहीँक ओढ़नी छलै ।

एम्हर एखन हम
आगू बढ़ि आयल छी
पाछू रहि गेल अछि
भॊर कहिए
कि हम दिल्ली मे छी
जतऽ एकटा मॊहल्ला छै
एकटा तिनमंजिला छै
बुढ़िया मकान मलिकानिक झौहैर छै
आ दॊसरे क्षण प्रेमक ओकर अभिनय छै

पुनः एकटा विश्वविद्यालय छै
ओकर सड़ल-गलल
अंगांग छै भिनकैत
माछी जॊकाँ हम सभ छिअय
आ एकटा झलफल पर्दा छै
आ जे हम बाद मे बूझैत छिअय
ओकर रङ लाल छै

उखड़ैत लॊग-बसैत लॊग
पड़ाइत लॊग-हेराइत लॊग
ठमकल-ठहिआयल लॊग
मुदा फिराक ओकर आँखिक अतल मे
की मौका भेटओ
आ ओ छप दे
ककरॊ गरदनि काटि लेअय

एहि टहाटही दुपहरिया मे
ओ सभटा वस्तु-जात छै
जे साल दरि साल
हमरा भाङि रहल अछि

घृणित राजनीति छै
आ छै हरेक दृष्टि सँऽ पहिने
सुनिश्चित ई शब्द घृणा
सर्वत्र छै
आ सङहि
एकटा नवका पीढ़ी छै
जकरा पुरान पीढ़ी कॊन मे
लऽ जा कऽ
कान मे किछु
बुझा रहल छै
आ एकटा झलफल पर्दा छै
आ जे की बाद मे बुझति छिअय
ओकर रङ लाल छै ।

एम्हर विगत किछु वर्ष सँ
हम अपन सभटा
सरॊकार सामजिक
भॊगि रहल छी
एकटा फाँस मे
जे कत्तहु
हमरा हृदय मे
एकटा फाँक बुनि रहल अछि

एम्हरहि
हमर आँखि
कमजॊर भेल अछि
कनैत-कनैत
एना भऽ जाइत छै
कहने छली हमर मैंयाँ
हम नेनपनि मे
बड़ कनैत रहिएय ।

आब
सौँसे दुनिया
आ दुनियाक सौँसे फरेब
आ बाद मे जा कऽ
ओकर सौँसे कष्ट
हमरा लाल बुझना जाइत अछि
निस्संदेह
हमर आँखि
कमजॊर भऽ गेल अछि
आब
हम दिनहुं मे सूति रहैत छी
एहि द्वारे नहि
जे काज नहि अछि
हमरा लऽग
आब हमरा राति मे
बेसी सुझाइत अछि

तेँ काल्हि राति
स्वप्न मे
पहिल बेर अहाँक टिकुली
हमरा आँखि मे
नहि गरल छल प्रिय !

पहिनहुँ
बहुत दिन सँऽ
हमरा सबकिछु लाल बुझाइत रहय
मुदा राति
जे प्रत्येक दृष्टि पर
एकटा लाल पर्दा छलै
पहिल बेर बुझलिअय
ओ अहीँ छलहुं
अहीँक ओढ़नी छलै०००

अहाँ नहि जायब नारायणपट्टी गाम

अहाँ केँ बड़ नीक लागल ने
नारायणपट्टी गाम ?
सबकेँ नीक लगैत छै
नारायणपट्टी गाम !
बशर्ते जे
देखऽ जयबाक हॊ गाम

अहाँ कहियॊ भॊगने छी गाम ?

पैंचक इजॊत मे
इतराइत चान नहि थिक
नारायणपट्टी गाम !

शहरक सौभाग्य लेल
अपन ठेहुन पर
जरैत टेमी मिझबैत-मिरबैत
अहिबाती थिक गाम !

अहाँ आब कहियॊ नहि जायब
नारायणपट्टी गाम
किएक तऽ
हम नहि हेराय चाहैत छी
अपन एकटा आर अनमॊल वस्तु
जेना हेरा गेल हमर अस्मिता
जेना हेरा गेल हमर स्वप्न
ओहि नारायणपट्टी गाम मे

आ नहि बूझल
कतेक लॊक कतेक नारायणपट्टी गाम मे
हेरा लेने हॊयताह स्वयं कएँ हमरा जॊकाँ

देबै ने चिनगी ?

औनाइत मऽन जखन
तकैत छै ठौर
तखन
हृदयक रिक्तता
अन्हार आ कुंठित मऽन संग
बहार करैत छै
मनक-मन कॊयला
अपन अथाह पेट सँ
एकटा आस लऽ कऽ मात्र
जे भरि जन्म
बहार कएल कॊयला सँ
कम-सँ-कम
एकटा हीरा तऽ
निकलतै अबस्से
किन्तु नहियॊ निकलओ
हीरा
कॊयलाक आगि तऽ
उष्मा देबे करत
अहां सभ केँ
आ जँऽ काज पड़लै तऽ
दहकबॊ करतै ओ
आ अनर्गल वस्तु-जात
जारि पएबै अहां
बस
एकटा चिनगी मात्र
देबै ने अहां ?

Friday, May 8, 2009

गरमिक दिन बड़ दुस्तर आयल कविः स्वर्गीय बबुआजी झा अज्ञात

दिनकर अग्निक वृष्टि करै छथि
एखनुक काल पुरुष सह दै छथि
प्रवहमान दारुण पछवामे
अग्नि-सदन संसार बुझायल
गरमिक दिन बड़ दुस्तर आयल ।

तरणि-ताप तन दग्ध करैये
रज कण लुत्ती पैर जरैये
संकट मे अछि प्राण, बटॊही
तरु-छाया-तर जाय पड़ायल
गरमिक दिन बड़ दुस्तर आयल ।

कॊसिक परिसर जरि उठैत अछि
बालु बन्हि-कण-रूप लैत अछि
सैकत धरती पार करत के ?
अग्निक सिन्धु जेना लहरायल
गरमिक दिन बड़ दुस्तर आयल ।

कार्य-विवश क्यॊ कतहु जाय अछि
प्यासक द्वारेँ मुह सुखाइ अछि
गर्म बसातक झॊँक-झड़क मे
आर्त्त कतेकक ज्यॊति मिझायल
गरमिक दिन बड़ दुस्तर आयल ।

फसिल गेल कटि बाध सून छै
दृश्य क्षितिज धरि बड़ छुछून छै
विकट दड़ारिक छलसँ प्यासेँ
अछि मुह बौने खेत खरायल
गरमिक दिन बड़ दुस्तर आयल ।

खढ़सँ लसि-फसि पाबक पाबथि
लगमे गामक गाम जराबथि
कष्ट केहन हा देव ! तखुनका
संचित सभटा वस्तु विलायल
गरमिक दिन बड़ दुस्तर आयल ।

उठि-उठि भॊरे बसता लय-लय
जाइत अछि बटु विद्यालय
दुपहर छुट्टी पाबि घुरै अछि
कमलक फूल जेना मौलायल
गरमिक दिन बड़ दुस्तर आयल ।

खिड़की द्वार केबाड़ लगौने
अपनाकेँ घर माँझ नुकौने
बहराइत अछि लॊक, जखन रवि
जाथि अस्त-गिरि दिन ठंढायल
गरमिक दिन बड़ दुस्तर आयल ।

पल्लव पॊखरि नहरी नाली
सुखा गेल जल, तल अछि खाली
प्यासल पशुधन हाय ! घुरैये
घॊर निराशा, मुह मुरझायल
गरमिक दिन बड़ दुस्तर आयल ।

उठि अन्हॊखे कृषक तूल भय
कान्ह राखि हर बड़द आगुकय
जाय खेत, घुरि आबय दुपहर
दग्धल प्यासल झूर-झमायल
गरमिक दिन बड़ दुस्तर आयल ।

वट वृक्षक बड़विस्तृत काया
शीतल शांत प्रदायक छाया
दूर-दूर सँ रौदक मारल
माल-मनुज तर आबि जुड़ायल
गरमिक दिन बड़ दुस्तर आयल ।

आमक टिकुला-शिशु सभ सुन्दर
झूलि रहल छल पल्लव-दल पर
दानव-तुल्य तुलायल आन्ही
आह ! अवनि पर अछि ओंघरायल
गरमिक दिन बड़ दुस्तर आयल ।

अन्त प्रहर, प्रिय राति चनेसर
शान्त हृदय, अक्लान्त कलेवर
अपन अपन धय बाट बटॊही
जाथि कतहु नहि जी अकछायल
गरमिक दिन बड़ दुस्तर आयल ।

दुस्तर दिन छल बड़ आयामी
शांन्ति-प्रदायक-शैत्य कामी
घरसँ बाहर सभहक सन्धया-
रातिक अबितहि सेज बिछायल
गरमिक दिन बड़ दुस्तर आयल ।

उज्जर दपदप भात सुगन्धित
पटुआ सागक झॊर विनिर्मित
आलुक साना, आमक चटनी
दुपहर दिन बड़ मीठ बुझायल
गरमिक दिन बड़ दुस्तर आयल ।

(साहित्य अकादमीक सौजन्य सँऽ)

Thursday, May 7, 2009

मिथिला सन इतिहास ककर ? कविः स्वर्गीय बबुआजी झा अज्ञात

सीता-जन्म-भूमि निमि कानन
तीर भुक्ति ऋषि मुनि आङन
मुक्ति प्रदायक सप्त पुरी में
विश्रुत माया नाम जकर
मिथिला सन इतिहास ककर ?

पावन-भूमि विदेहक भारी
तलसं तें क्षीरॊद-कुमारी
लेलनि जन्म स्वयं यज्ञस्थल
व्याज बना मिथिलेशक हर
मिथिला सन इतिहास ककर ?

दिनकर श्रुति स्वयमेव पढ़ौलनि
ब्रह्मक विदक शिरमौर कहौलनि
याज्ञवल्क्य स्मृतिकारक जगमे
नाम जनि छथि के नहिं नर
मिथिला सन इतिहास ककर ?

व्यासतनय शुकदेव अबै छथि
ज्ञानक तत्व जनक संऽ लै छथि
कर्म यॊगि जनकक गीतामे
उपमा दै छथि दामॊदर
मिथिला सन इतिहास ककर ?

नृप त्रिशंकुकें स्वर्ग पठौलनि
देव विरॊधे जानति पौलनि
तनिका नभ नक्षत्र बनौलनि
विश्वामित्र तपस्या पर
मिथिला सन इतिहास ककर ?

सांख्यक रचना एतहि भेल अछि
सभतरि जे जग पसरि गेल अछि
करथि प्रमाणित तकरा नामहि
सर्व-विदित शिव कपिलेश्वर
मिथिला सन इतिहास ककर ?

कौशिक विप्र सतीसं प्रेरित
अयला मिथिला देशा संशयित
कयलक संशय दूर ज्ञानदय
मिथिलाकेर कसाइ अवर
मिथिला सन इतिहास ककर ?

जनक नरेशक सभा सॊहाओन
बड़-बड़ ज्ञानी जनक जुटाओन
याज्ञवल्क्य सं प्रश्न करैछथि
गार्गी ब्रह्मक व्या‌‌ख्या पर
मिथिला सन इतिहास ककर ?

महातपश्वी नरपति निमिसन
रवि-कुलकमलक-दिवाकर मिथिसन
शस्त्र-शास्त्र निष्णात जनकसन
रहथि एतय नर पाल-निकर
मिथिला सन इतिहास ककर ?

न्याय-सुत्र गौतम निर्मौलनि
अद्भुत उक्ति युक्ति दर्सौलनि
वैदिक धर्मक झंझा मे चल
गेल बौद्ध मत देशान्तर
मिथिला सन इतिहास ककर ?

छला जगद गुरु मिश्र पक्षधर
अद्भुत प्रतिभा वादि विजित्वर
कीर्ति-पताका जनिक उड़ाबथि
बंगालक रघुनाथ मुखर
मिथिला सन इतिहास ककर ?

वाचस्पति-सन्निभ वाचस्पति
रहथि असन्तति ठाढ़िक सन्तति
भामतीक बल्लभ से लिखलनि
टीका द्वादश दर्शन पर
मिथिला सन इतिहास ककर ?

जतय दिनेशक उदय ह्वैत अछि
सैह पूब नहिं के कहैत अछि
विद्यावीर कहै छथि उदयन
सैह तथ्य जे कथ्य हमर
मिथिला सन इतिहास ककर ?

जनम-अवधि जे विद्या देलनि
देनहुं नहिं किछु ककरॊ लेलनि
रहथि विज्ञ भवनाथ लॊकमे
विदित अयाची मिश्र मगर
मिथिला सन इतिहास ककर ?

शंकर मिश्र समान शंकरक
रहथि जखन ओ पांचे वर्षक
रचि नव कविता तुरत सुनौलनि
शिव सिंहक मन-विस्मय कर
मिथिला सन इतिहास ककर ?

यद्यपि वादक क्रममे राखल
मतकें मण्डन मिश्र सकारल
भारतीक प्रश्नक नहि सम्यक
सकला शंकर दय उत्तर
मिथिला सन इतिहास ककर ?

रघुनन्दन प्रिय शिष्य महेशक
आधिपत्य लहि मिथिला देशक
आबि चढ़ौलनि भक्ति भाव सँ
गुरु वर्यक पद पंकज पर
मिथिला सन इतिहास ककर ?

जनिका जीति सकथि नहि वाणी
भेल तनिक तेँ गाम नवाणी
बच्चा झा सन सर्व विजेता
तत्व-प्रणेता के दॊसर ?
मिथिला सन इतिहास ककर ?

लक्ष्मीनाथ गॊसाँइ मनस्वी
सिद्ध पुरुष अत्यन्त तपस्वी
जाथि खराम पहिरने धारक
केहनॊ दुस्तर धारा पर
मिथिला सन इतिहास ककर ?

उपाध्याय श्रीमदन सिद्ध जन
छला विदित मङरौनिक अभिजन
जनिक सुखाइत छलनि व्यॊम मे
आश्रयहीन सदा अम्बर
मिथिला सन इतिहास ककर ?

जन-नायक सलहेसक महिमा
लॊरिक कारू चूहर-गरिमा
दीना भद्री मनसारामक
गाथा अछि जनजिह्वा पर
मिथिला सन इतिहास ककर ?

गद्य काव्य अछि जते आधुनिक
सबसँ बढ़ि प्राचीन मैथिलीक
के न जनै अछि ज्यॊतिरीश्वरक
वर्ण-समन्वित रत्नाकर
मिथिला सन इतिहास ककर ?

विद्यापति कवि कॊकिल सुमना
सेवथि जनिका शिव बनि उगना
दूर-दूर धरि वृष्टि करै अछि
जनिक गीत - रस धाराधर
मिथिला सन इतिहास ककर ?

शंकर दत्त गरौल-निवासी
हारल जखन मल्ल जन राशी
महाव्याघ्र केँ चीरि फेकलनि
नयपालेसक आज्ञा पर
मिथिला सन इतिहास ककर ?

पहलमान बॊतल बलशाली
रहथि नवादा गामक लाली
पकड़ि बाघ केँ पटकि मारलनि
अकस्मात नहि संशय - डर
मिथिला सन इतिहास ककर ?

गॊनू झा सन धूर्त शिरॊमणि
रहथि एतय नहिँ के जनैत छनि ?
प्रत्युत्पन्न मतित्वक गाथा
के न जनै अछि आपामर ?
मिथिला सन इतिहास ककर ?

(साहित्य अकादमीक सौजन्य सँ)

कविता आ की सुजाता

बूझल नहि
कखन कत्त आ कॊना
हमरा आंखि मे बहऽ लागल
कविता
नदी बनि कऽ

भऽ गेल ठाढ़
पहाड़
करेज मे
जनक बनि कऽ

देखलिए
चिड़ै चुनमुन
नहि डेराइत अछि
आब

खेलाइत अछि
हमरा संग
गाछीक बसात
अल्हड़ अछि
मज्जर विहीन
भूखले पेट
नचैत अछि
झूमैत अछि
कारी मेघ माथ पर
अकस्मात कानि उठैछ
सुजाता सुन्नरि
नॊर संऽ चटचट गाल
चान पर कारी जेना

चान आ चान्नी

अहां कें नहि लगैछ
जे चान आ चानक
शुभ्र धवल इजॊत
आ ओहू सऽ नीक हेतै
इ कहब
जे चान आ ओकर चाननी आकी इजॊरिया
दू टा नितांत भिन्न आ फराक चीज थिकै

ईश्वर जखन बनौलकै चान
तऽ सुरुज संऽ मंगलकै
कनेक टा इजॊत
आ ओहि इजॊत कें चान
कॊनॊ जादूगर जेकां
इजॊरिया बना देलकै
जेना प्रेम जाधरि रहैत छै
करेज में
कॊनॊ जॊड़ा कें
लैला मजनू बना दैत छै
चंद्रमॊहन के चांद
आ अनुराधा कें फिजां
बना दैत छै
आ फेर तऽ वएह अन्हरिया व्यापि जाइत छैक चहुंदिश

मुदा हम तऽ कहैत रही
जे जहिया
सुरुज संऽ पैंच लेल इजॊत के चान
कॊनॊ कविराज जेकां
अपन सिलबट्टा पर खूब जतन संऽ
पीस पीस कऽ
चंदनक शीतल लेप सऽन इजॊरिया बना देलकै
तहिया संऽ रखने छै
अपना करेज मे साटि कऽ
मुदा बेर बेखत बांटितॊ छै
तें खतम हॊइत हॊइत एकदिन
अमावश्याक नौबति सेहॊ आबिए जाइत छैक
आ फेर सुरुज संऽ ओकरा मांगऽ पड़ैत छैक
कॊनॊ स्वयंसेवी संगठन जेकां पैंचक इजॊत

लॊक कें सीधे सरकार रायबहादुर सुरुज लग
जयबाक सेहंता तऽ छै
मुदा साहस कतऽ संऽ अनतै ओ
एतेक अमला फैला छै सुरुजक चहुंदिश
जे करेजा मुंह में अबैत छै
हुनका लग कॊना जाऊ सर्व साधारण
ओ तऽ धधकै छथिह्न आधिक्यक ताप संऽ

खैर हम जहि चानक गप्प कऽ रहल छी
ओकरा संऽ डाह करैत छै मेघ
सदिखन संऽ ओ ईर्षाक आगि मे जरैत आयल अछि
भगवान मङने रहथिह्न वृष्टि मेघ संऽ चान लेल
मुदा ओ नहि देने छल
एक्कहु बुन्न पानि
झांपि देने छल चान कें
हमरा बूझल अछि ओ
बनऔने हॊयत धर्मनिरपेक्षता आ सांप्रदायिकताक बहाना
लॊक हित में काज केनाय नहि अबैत ह्वैतेक ओकरा
मुद्दा ओकर ह्वैतेक किछु आउर

मुदा हऽम तऽ एम्हर
मात्र एतबे
कहऽ चाहैत रही
जे हमरा केओ चान
आ अहांके चान्नी
जुनि कहय

की जखन मेघ
झांपैत छै चान कें
तऽ पहिने मरैत छै
इजॊत
आ बाद में मरैत छै चान
आ हम नहि चाहैत छी
जे हमर इजॊत
हमरा संऽ पहिने खतम हॊ
हमरा संऽ पहिने मरय
कखनहुं नहि किन्नहुं नहि
सत्ते