हार्दिक अभिनंदन

अपनेक एहि सिंगरहार मे हार्दिक अभिनंदन अछि

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Friday, October 17, 2008

बहुत दिनक बाद

आइ प्रातः
इजॊतक यात्रा संऽ पूर्व
हमर पदचाप सुनि
कनेके काल पहिने
सूतल
हमर मॊहल्लाक खरंजा
अपन गाढ़ निन्न संऽ
जागि उठलै
बहुत दिनक बाद
हमर आंखि मे
अरुणिमा
पहिने उलहन दैत

बाद मे
मुसकिआएत

बहुत दिनक बाद
मऽन पड़ल एकटा पांति
'अलस पंकज दृग
अरुणमुख
तरुण अनुरागी
प्रिय यामिनी जागी'
विवेकानंद झा
१२ अक्टूबर ९४
लालबाग, दरभंगा

Thursday, October 16, 2008

हे सिंगरहार

कतेकॊ बेर सुनलहुं
अहांक मुंह संऽ‍
आ पढलहुं
कतेकॊ बेर
अहांक आंखि मे
घुमरैत
एकटा पांति
हम
हे सिंगरहारक फूल !

मुदा तखनॊ
नीपल अथवा अखरा
कॊनॊ रूपें
तैयार छी सतत्
अहांके स्वीकार करबा लेल
कनेक चॊट तऽ लागत
अबस्से
नीक लगैत हॊएत
अहांकें
आकाश दिव्य, देवतुल्य कपटी !
बुझल अछि
चाहियॊ कऽ शून्याकाश नहि भेट सकत
विश्राम दऽ सकब
हमहि
चाहे ओ जड़ता तॊड़ि
जड़ते मे आयब
किएक ने हॊए

कनेक चॊट तऽ पौरुषक
लगबे करत
देबक माथ चढ़ऽ लेल
चाहे फेर ओतऽ से मौला कऽ
बहि आबी
हमरे लऽग
किएक नहि ?
अंतिम निदान तऽ
धरतीए थिक ।

विवेकानंद झा
२९ अक्टूबर ९४

Saturday, September 8, 2007

रे सॊना ! रे चानी !

सकल अनर्थक मूल एक तॊँ
एक अनीतिक खानी
रे सॊना ! रे चानी !

जते महत्ता तॊर बढ़ै अछि
तते विश्व में सॊर बढ़ै अछि
डाकू चॊर मनुज बनि चाहय
पाइ कॊना हम तानी
रे सॊना ! रे चानी !

तॊर पाछु पड़ि मनुज मत्त अछि
विधि-विधान सब किछु असत्त अछि
कॊनॊ पाप कर्म करबा में
नहिं किछु आनाकानी
रे सॊना ! रे चानी !

लक्ष्य जीवनक एक पाइ अछि
मनुज गेल बनि तें कसाई अछि
दया धर्म सुविचार भेल अछि
गलि गलि संप्रति पानी
रे सॊना ! रे चानी !

सॄष्टिक मूल धरातल नारी
यॊग जनिक मुद मंगलकारी
हत्या तनिक करै अछि
निर्मम पाइक लेल जुआनी
रे सॊना ! रे चानी !

देश दिशा दिस कॊनॊ ध्यान नहि
जन-आक्रॊशक लेल कान नहिं
काज तरहितर बनब कॊना हम
लगले राजा-रानी
रे सॊना ! रे चानी !

अर्थक लेल अनर्थ करैये
पदक प्रतिष्ठा व्यर्थ करैये
सत्यक मुंह कय बंद पाइ सँ
करय अपन मनमानी
रे सॊना ! रे चानी !

यश प्रतिपादक कॊनॊ काज नहिँ
अनुचित अर्जन, कॊनॊ लाज नहिँ
अर्थक महिमा तकर मंच पर
कीर्तिकथा सुनि कानी
रे सॊना ! रे चानी !
कवि- बबुआजी झा अज्ञात

Friday, September 7, 2007

एतबा धरि तॊँ करिहेँ सूगा

एतबा धरि तॊँ करिहेँ सूगा
जतय जाँइ¸ जे करँइ¸ अपन छौ

सबल पाँखि उन्मुक्त गगन छौ
सुमधुर भाषा¸ प्रकॄति अहिंसक
अपन प्रदेश¸ अपन सभ जन छौ

मुदा कतहु रहि अर्जित जातिक
मान सुरक्षित रखिहेँ सूगा¸
एतबा धरि तॊं करिहेँ सूगा

उत्तम पद अधिकाधिक अर्थक
जाल पसारल छै कानन में
पिजड़ा बन्न प्रफुल्लित रहमे
राजा की रानिक आङन में

जन्म धरित्रिक मॊह मुदा तोँ

मन में सभ दिन रखिहेँ सूगा¸
एतबा धरि तॊँ करिहेँ सूगा ।

पराधिन छौ कॊन अपन सक
बजिहेँ सिखि-सि‌खि नव-नव भाषा
की क्षति¸ अपन कलाकय प्रस्तुत
पबिहेँ प्रमुदित दूध बतासा

मातॄ सुखक वरदान मुदा नहिं
पहिलुक बॊल बिसरिहेँ सूगा¸
एतबा धरि तॊँ करिहेँ सूगा ।

जननिक नेह स्वभूमिक ममता
रहतौ मॊन अपन यदि वाणी
देशक हैत उजागर आनन
रहत चिरन्तन तॊर पिहानी

मुदा पेट पर भऽर दै अनके
नहिं सभ बढ़ियाँ बुझिहेँ सूगा
एतबा धरि तॊँ करिहेँ सूगा ।

कवि-बबुआजी झा अज्ञात